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Sixth Canto of Kurukshetra?-कुरुक्षेत्र के छठा सर्ग?

Sixth Canto of Kurukshetra?-कुरुक्षेत्र के छठा सर्ग?

नमस्कार दोस्तो आज हम कुरुक्षेत्र के छठा सर्ग के बारे  मै विस्तार से  बताएँगे ये exams बहुत बार आ चुका ओर इस प्रश्न बहुत अधिक नंबर होते है इसलिए इस प्रश्न का उत्तर जानना हमरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है 

कुरुक्षेत्र के छठा सर्ग

कुरुक्षेत्र के छटा सर्ग के विषय मै स्वयं कवि ने लिखा है की पूरा का पूरा छठा सर्ग ऐसा ही क्षेपक है , जो इस काव्य से टूट कर अलग भी हो जाता है । कवि की इस उक्ति नेऐसी भ्रांति उत्पन्न की की एक आलोचक ने यहा तक कह डाला की “ छठा सर्ग मै कवि का शंकालु ह्रदय मस्तिक के इतने ऊंचे स्तर पर चढ़कर बोला है की उसके सामने न केवल व्दापर रह गया है है बल्कि चारो युग , तीनों काल ओर दोनों गोलार्ध घूमने लगे है ।

इसी प्रकार की भ्रांति धारणायो का निष्कर्ष यह भी है की सर्ग मै वक्त विचारो का संबंद ऐसे मानव से है जो विज्ञान की प्रगति , व्यक्ति ओर समुदाय के विश्वास तथा युद्ध ओर शांति के झगड़ो के प्रति शंकालु ओर आस्थाहीन हो । छठा सर्ग कथा प्रबंध की दृष्टि से कृरुक्षत्र से विच्छिन्न अवशय लगता है  ओर हम ऐसा कह सकते है की

इसका संबंध न तो युधिस्टीर से है न हो भीष्म से । यह सर्ग वास्तव मै मुक्त चिंतन बनकर रह गया है । किन्तु कृरुक्षेत्र के उद्देशय की दृष्टि से यदि हम विचार करें तो यह स्पस्ट हो जाता है की यह सर्ग कृरुक्षेत्र का अपरिहार्य अंग है ओर चुकीं उद्देशय भी किसी प्रबंध काव्य की अनिवार्य अवशयकता है । अत : उद्देशय की वस्तु को हम

किसी प्रबंध की निरथर्क वस्तु नहीं कह सकते । इस दृष्टि से कांतिमोहत सिह का अनुशीलन काव्य के प्रतिपाद्य से परिचित होने के लिए सर्वधिक सहायक है । “ इस सार्क के अध्यायन से यह बात बिलकुल साफ हो जाती कवि का मूल प्रतिपादन मानव कल्याण ही है , कोई मतवाद नहीं । अत : यहा छठा सर्ग क विशद विवेचन व्दारा उसकी सार्थकता सिद्ध की जा रही है ।

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